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Article   | शैक्षिक लेखन – चुनौतियां और संभावनाएं


आधुनिक युग में शैक्षिक लेखन को एक अलग प्रकार की विधा के रूप में मान्यता मिलती जा रही है । यह प्रकटीकरण की एक विशेष शैली है जिसका उपयोग शोधकर्ता अपनी विशेशज्ञता के क्षेत्र की बौद्धिक सीमाओं को परिभाषित करने के लिए करते हैं । कथा साहित्य अथवा पत्रकारिता संबंधी लेखन के विपरीत, शैक्षिक लेखन का समग्र ढांचा विशिष्ट तथा तार्किक होता है ।

अधिकतर शोधपत्रों के लेखन में समाहित मुख्य शैलीगत तत्व जैसे भूमिका,लहजा,शब्द योजना, भाषा, विराम चिन्ह, प्रमाण आधारित तर्क, जटिलता और अकादमिक रिवाज इत्यादि सजग ध्यानाकर्षण की मांग करते हैं । परंपरागत शैक्षिक लेखन में संदर्भोत्तर अपरिभाषित जटिल शब्दों का बहुतायत से समावेश किया जाता था परंतु वर्तमान समय के तीव्र गति से विकसित होते शोध कार्यों के बाढ़ में विशेषीकृत शब्दावली के अतिशय प्रयोग व अनुपयुक्त प्रयोग से बचा जाना चाहिए । विशेषीकृत शब्दावली के प्रयोग को समझने के अतिरिक्त लेखन के कुछ अन्य महत्वपूर्ण आयामों पर भी साथ ही साथ पकड़ बनाए रखना सामयिक होगा । व्यक्तिवाचक संज्ञा के अधिक प्रयोग से बचना, निर्देशात्मक शब्दों के प्रयोग से यथासंभव दूरी , उबाऊ शब्द बहुलता , अस्पष्ट भाव जैसे वे, हम,लोग, इत्यादि संदर्भ शोधपत्र की गंभीरता को कम करते हैं । व्यकिगत अनुभवों का वर्णन शोध समस्या को समझे जाने का एक सशक्त माध्यम हो सकता है । किसी को उद् धृत करते समय व्याकरण की शुद्धता एवम् शब्द योजना की यथार्थता निरर्थक है । शैक्षिक लेखन को और बेहतर बनाने के लिए स्पष्ट लेखन , उत्कृट व्याकरण तथा यथार्थ वर्गीकृत तरीका वे क्षेत्र हैं जिनपर ध्यान केन्द्रित किया जाना चाहिए ।

शैक्षिक लेखन के मूल्यांकन हेतु पाठक के दृष्टिकोण से कुछ मुद्दों का परीक्षण आवश्यक है जैसे – इसका एक सुस्पष्ट शोध समस्या पर आधारित होना , शोधपत्र का पाठक को बताना कि क्यों यह समस्या महत्वपूर्ण है और क्यों लोगों को इसके बारे में जानना चाहिए ।
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